The Deshbhakt
May 30, 2026
TL;DR
ट्रंप की ईरान के साथ 90 दिन की लड़ाई विफल हुई है; अब वह ईरान की शर्तों पर समझौता करने को मजबूर है, लेकिन अभी तक कोई पक्की डील नहीं हुई है।
“प्लीज प्लीज सर मेक अल आई विल डू एनीथिंग। आई विल डू एनीथिंग सर।”
— ट्रंप (व्यंग्य के साथ प्रस्तुत)
“बिकॉज़ ही हैज़ मोर टू लूज़।”
— विश्लेषक (ईरान की स्थिति के बारे में)
“कोई भी डील वही जीतता है जो बातों के बाद युद्ध के लिए तैयार रहता है।”
— गालिबाफ (ईरान के संसद अध्यक्ष)
“एंड एग्रीमेंट हैज़ बीन लार्जली नेगोशिएटेड।”
— ट्रंप (ट्रुथ सोशल पर)
1. युद्ध की शुरुआत और ट्रंप के वादे
28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले किए। ट्रंप ने पांच स्पष्ट लक्ष्य बताए: रिजीम परिवर्तन, मिसाइल क्षमता खत्म करना, परमाणु हथियार रोकना, यूरेनियम निकालना और हॉर्मूस को नियंत्रित करना। उन्होंने दावा किया कि आयतुल्लाह खमीनी समेत 40 से अधिक शीर्ष नेताओं को मार गिराया गया है।
2. ईरान का असली प्रतिरोध
ईरान ने केवल अमेरिकी हमलों को सहा नहीं, बल्कि उसने ड्रोन और मिसाइल हमले किए, हॉर्मूस जलडमरूमध्य को तीन महीने तक बंद रखा और अमेरिकी नौसेना को पीछे हटने पर मजबूर किया। ईरान का मॉस्किटो ब्रिगेड प्रभावी साबित हुआ।
3. ड्राफ्ट डील के विवरण
पांच महीने के बाद जो ड्राफ्ट 60-दिवसीय समझोते का रूपरेखा सामने आया, उसमें सीज-फायर एक्सटेंशन, हॉर्मूस से नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, ईरान की जमी संपत्तियों को रिहा करना और 300 बिलियन डॉलर के निवेश की बातें हैं। लेकिन परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल और प्रॉक्सी नेटवर्क पर कोई सहमति नहीं है।
4. हॉर्मूस का नियंत्रण मुद्दा
ट्रंप चाहते थे कि हॉर्मूस टोल-मुक्त रहे, लेकिन ईरान ने स्थायी फारसी खाड़ी जलडमरूमध्य प्राधिकरण स्थापित किया है। ईरान ओमान के साथ इसे संचालित करना चाहता है, जिससे ट्रंप गुस्से में हैं और ओमान पर भी हमले की धमकी दे रहे हैं।
5. ईरान की बातचीत की रणनीति
ईरान के संसद अध्यक्ष गालिबाफ कहते हैं कि ईरान की मांगें मिसाइल शक्ति के दम पर की जा रही हैं, भीख नहीं। अमेरिकी वार्ताकार खुद ईरान को संदेश भेज रहे हैं कि ट्रंप के ट्वीट गंभीर नहीं हैं। ईरान जानता है कि ट्रंप केवल शक्ति समझते हैं।
6. ट्रंप की भ्रामक बयानबाजी
ट्रंप अप्रैल में यूरेनियम के बारे में कहते हैं कि वह खतरे में नहीं है, फिर कहते हैं कि वह इसे निकाल लेंगे, फिर कहते हैं कि चीन इसे खोद सकता है। अंत में ईरान की घोषणा है कि कोई यूरेनियम हस्तांतरण नहीं होगा। ट्रंप को अपने लक्ष्य ही नहीं पता।
7. अमेरिकी हितों की पुनर्परिभाषा
जब सीज-फायर का विस्तार मुश्किल साबित होता है, तो ट्रंप गल्फ देशों को इब्राहिम समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालते हैं। वह नेतन्याहू को भी फोन करते हैं। अंत में घोषणा करते हैं कि डील तय हो गई, लेकिन कोई सार्वजनिक विवरण नहीं आते।
8. भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
इस 90-दिन की लड़ाई में भारत समेत दुनिया को परिणाम भुगतने पड़े। भारत का रुपया गिरा, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं। तेल की आपूर्ति में असंतुलन हुआ और आर्थिक व्यवस्था को झटका लगा। भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति जोखिम भरी है।
9. वैश्विक शक्ति गतिशीलता में परिवर्तन
ईरान ने साबित किया है कि छोटे बजट के साथ भी वह अमेरिका को चुनौती दे सकता है। रूस-चीन-ईरान गठबंधन मजबूत हुआ है। चीन के उपग्रहों ने ईरानी मिसाइलों को निर्देशित किया, रूस के उपग्रहों ने अमेरिकी जहाजों को ट्रैक किया। यह प्रणाली अब संरचित है और काम करती है। चीन ताइवान के बारे में अमेरिका की कमजोरी देख रहा है।
10. ट्रंप के अन्य लक्ष्य और भविष्य की दिशा
ईरान से हारने के बाद ट्रंप अन्य देशों पर अपना गुस्सा निकाल सकते हैं। ग्रीनलैंड, क्यूबा और भारत के साथ उनके रुख के बारे में सवाल उठ रहे हैं। मिड-टर्म चुनाव आने वाले हैं। अब देखना है कि यह हार उनकी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को कैसे प्रभावित करेगी।